Wednesday, August 1, 2012

नए दौर के हमारे नायक बाजारवाद के ही उत्पाद हैं


चिन्तामणि मिश्र  
 फिल्मों से कई दशक पहले रिटायर हो गए राजेश खन्ना के निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा पक्ष-विपक्ष के कई नेताओं ने शोक प्रगट किया। मीडिया ने जीवन-चरित्र के रंगीन पृष्ठ छापे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो उनकी शवयात्रा और मरघट से सीधा जीवन्त प्रसारण किया। राजेश खन्ना साठ के दशक में बॉलीवुड के सुपरस्टार थे, फिर नई पीढ़ी ने नए सुपर स्टार गढ़ लिए और राजेश खन्ना हाशिए पर चले गए। कांग्रेस ने उन्हें राजनीति में उतारा। 1991 में वे नईदिल्ली की एक लोकसभा सीट से भारी मतों से निर्वाचित भी हुए किन्तु सियासत के सिनेमाघर में यह उनकी पहली और अंतिम फिल्म साबित हुई। वास्तव में मृत्यु किसी की भी हो, हमेशा दुखदायी होती है। विशेष रूप से वे तमाम लोग जो मृतक से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं उन्हें मौत झकझोर देती है। जाहिर है कि हमारे देश के शासक और राज-नेता भी राजेश खन्ना से भावनात्मक रूप से जुड़े रहे होगें, इसलिए उनकी मौत से उनका दुखी होना स्वाभाविक है। मनुष्यता और सामाजिकता के नाते राजेश खन्ना के निधन से हर कोई दुखी है, किन्तु हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों को उन आम लोगों के असमय निधन पर जो प्रशासनिक अव्यस्था के शिकार हुए हैं, गहरा या उथला ही सही दुख क्यों नहीं होता? हमारी बस्ती का एक नौजवान अनजानी औरत को लूट का शिकार बना कर भाग रहे लुटेरे से निहत्था भिड़ गया और लुटेरे ने इस साहसी युवक पर छूरे से इतने वार किए कि बहादुर युवक गैर के लिए मारा गया। उसने अपने बच्चों, अपनी बीबी अपने परिवार के भविष्य के लिए कुछ नहीं सोचा। हमारे प्रधानमंत्री, हमारे महामहिम के पास ऐसे बहादुरों के लिए संवेदना और शोक प्रगट करने के लिए समय और शब्द का अकाल है। ऐसी दुखदायी घटनाएं देश में कहीं न कहीं होती रहती हैं, किन्तु इस तरह की त्रासदी के शिकार गरीब और चिरकुट होते हैं, अस्तु राजनैतिक दल तथा शासक इनके लिए कभी दुखी नहीं होते।
पिछले सात साल से कई लाख किसान सरकार की आर्थिक-कुनीति के कारण आत्महत्या करने के लिए विवश हुए, लेकिन शासकों के गिरोह के एक भी सदस्य की संवेदना देश के अन्नदाताओं के लिए कुलबुलाई तक नहीं। रस्म-अदायगी के लिए कभी सार्वजनिक रूप से किसी ने मुंह नहीं खोला। पश्चिम बंगाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्वभारती में वार्डन ने एक छात्रा को स्वमूत्र पीने के लिए बाध्य किया किन्तु इस अमानवीय और घिनौनी हरकत के लिए पीड़ित छात्रा से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास संवेदना प्रगट करने के लिए अवकाश नहीं है। वे दुखी होते हैं सेलेब्रेटी बिरादरी के लिए। विश्वभारती की यह छात्रा इस बिरादरी की नहीं थी। अपने देश में आम आदमी की गिनती ङींगुरों में होती हैं, वे जिन्दा रहें या फिर मर जाए, हमारे भाग्य विधाताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रधानमंत्री इस संस्था के विजीटर भी हैं किन्तु इस छात्रा व उसके परिवार को संवेदना का एक शब्द भी उनके पास नहीं है।
वास्तव में हमारा आज का समय राष्ट्र के लिए समर्पित इस्पाती नायकों की विहीनता का समय है। हमने अपने पुराने नायकों को विदा कर दिया है। इन्हें पाठ्य-पुस्तकों और इतिहास से भी धकेलने का काम शुरू है। अब हमारे नायक फिल्मों और क्रिकेट की पिच से पैदा किए जा रहे हैं। इन चाकलेटी नायकों को राष्ट्र-सेवा और हाशिए में धकेल दिए गए करोड़ों वंचितों से कोई मतलब नहीं हैं। कथित लोग काले धन के रूप में करोड़ों- करोड़ रुपयों को बटोर कर किसी मंदिर में हीरों से जड़ा सोने का मुकुट और करोड़ों रुपए की रकम का गुप्तदान तो करते हैं, किन्तु छत-विहीन, जलविही न, रोटी-विहीन, दवा-विहीन, वस्त्र-विहीन, शिक्षा-विहीन करोड़ों अभागों के लिए जो गरीबी से भी गरीब हैं, उन पर एक रुपए भी खर्च करने के लिए अपना दायित्व नहीं समझते। क्रिकेट की चकाचौध में सटोरियों, फिक्सरों द्वारा लिखी गई पटकथा के अनुसार पिच में खेल की नौटंकी करते है। अब ऐसी विरादरी राष्ट्रनायक बना कर पेश की जा रही है। विडम्बना ही है कि देश के तारणहार इन्हें संसद में नामजद करके देश-दुनिया को पक्की बेशर्मी से यह सन्देश दे रहे हैं कि अब देश में बुद्धिजीवियों, विद्वानों का घनघोर अकाल है। नाचने वाले, गाने वाले, गिल्ली-डंडा खेलने वालों से हमारी संसद धन्य हो रही है। उसका मान बढ़ रहा है। बात यही खतम नहीं होती, उन्हें सेना में आनरेरी कमीशन देकर यह ऐलान करने का प्रयास किया जाता है कि चिकित्सा, समाजसेवा, शिक्षा, अभियांत्रिकी, विज्ञान,पत्रकारिता, साहित्य में कमाल करने वालों को आनरेरी कमीशन देकर सेना की साख नहीं गिराई जाएगी। कैसी महान सोच है हमारी छाती पर बैठ कर ठुमरी अलाप रहे शासकों की कि-नाचोगे, गाओगे, खेलोगे तो बनोगे नबाब, पढोगे, लिखोगे तो दो कौड़ी के रहोगे जनाब।
भारत रत्न हमारा सर्वोच्च सम्मान है। इसकी कसौटी यह होनी चाहिए कि कोई ऐसी हस्ती जिसने अपने वक्त के सम्पूर्ण भारतीय समाज को इतनी गहराई से प्रभावित किया कि जिसकी सुगन्ध आने वाले लम्बे समय तक फैलती रहेगी। किन्तु ऐसा नहीं है, सत्ता के गलियारों में विचरण करती कठपुतलियां फैसले लेती हैं जो गलत लोगों को आगे बढ़ाती हैं, गलत फैसले लेती है। देश का रत्न जिसे हम कह सके वह कोई अच्छा खिलाड़ी हो यह नाकाफी है। पिछले दिनों क्रिकेट के बेहतरीन खिलाड़ी को भारत रत्न देने की जोरदार मुहिम चली जो अभी भी चल रही है। वे बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं, किन्तु इतना ही काफी नहीं है। सामाजिक, सांस्कृतिक, इंसानियत आदि हर स्तर पर भी जिसने गहराई से प्रभाव छोड़ा है यह भी कसौटी में शामिल होना चाहिए। असल में पिछले तीन दशक से देश में एक ऐसा खाया-अघाया और सम्पन्न समाज वाला सामंती राजनेताओं का कबीला विकसित होता जा रहा है, जिसे देश के फटेहाल तथा मजबूर बना दिए गए लोगों से कोई लेना देना नहीं है। यह बाजारवाद की देन है।
बाजारवाद का इस समय भक्तिकाल चल रहा है। बाजार हमें अपने नायक और महानायक फिल्म व क्रिकेट से गढ़ कर दे रहा है और हम इनकी आरती उतारने के लिए थाल सजाए गदगद हो रहे हैं। काली कमाई और गैरजिम्मेवारी के साथ अंहकार के कीचड़ में डूबे यह लोग बाजार के ही उत्पाद हैं। इनको महिमा मंडित करने के लिए वक्त के सुलतान गले में ढोलक डाले सोहर गा रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।)

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